डॉ० रोहिताश्व
अस्थाना पिछले तीन दशकों से लगातार सृजनरत हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं‘जल तरंग
बजते हैं’ (प्रणय गीत संग्रह), ‘माँझी’, ‘जय इंदिरा’ (खण्डकाव्य), ‘माटी की गंध’, ‘चाँदी
की चूड़ियाँ’ (उपन्यास) और ‘बाँसुरी विस्मित है’ (हिन्दी ग़ज़ल संग्रह)। हिन्दी
ग़ज़लों पर उन्होंने ‘हिन्दी ग़ज़ल : उद्भव और विकास’ नाम से सबसे पहला शोध-ग्रंथ भी
लिखा है। बाल साहित्य में भी उनके रचनात्मक योगदान पर काफी चर्चा हुई है। यहाँ
हम प्रस्तुत कर रहे हैं
डॉ० रोहिताश्व अस्थाना से आचार्य संजीव शर्मा
‘सलिल’ की बातचीत के मुख्य अंश
1. आपने अपने शोध-ग्रंथ ‘हिन्दी ग़ज़ल: उद्भव और विकास’ में ग़ज़ल के नामकरण से सम्बन्धित कई स्थापनाएँ दी हैं। लेकिन कुछ रचनाकारों का मत है कि ‘ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने दो, कोई नाम न दो।’
ग़ज़ल तो ग़ज़ल ही है लेकिन किन्तु जब उसकी रचना उर्दू छन्दशास्त्र की ‘रूक्न’ से बनी ‘बहर’ के आधार पर हो, उसका ‘वज्न’ उर्दू के ‘तक्तीय’ के आधार पर तोला जाय, उसका काफ़िया-रदीफ़ अरबी-फारसी-उर्दू की वर्णमाला के आधार पर रखा जाय तो वह उर्दू ग़ज़ल है।
2. हिन्दी ग़ज़ल इससे किस प्रकार भिन्न है ?
ग़ज़ल की रचना हिन्दी के ‘गण’ से निर्मित वर्णिक या मात्रिक ‘छन्द’ के आधार पर हो, उसका ‘पदभार’ हिन्दी की मात्रा गणना के आधार पर परखा जाय,उसका तुकान्त-पदान्त हिन्दी की वर्णमाला के अनुसार हो तो वह हिन्दी ग़ज़ल है।
3. क्या ग़ज़ल का कोई और भी प्रकार हो सकता है ?
हाँ, जब उर्दू की ‘बहरों’ के अनुसार हिन्दी मात्रा-गणना कर या हिन्दी के छन्दों के आधार पर उर्दू की ‘तक्तीय’ के मुताबिक ग़ज़ल लिखी जाय तो उसे मैं हिन्दुस्तानी ग़ज़ल कहता हूँ।
4.‘बाँसुरी विस्मित है’ में आपने किस प्रकार की ग़ज़लें प्रस्तुत की हैं ?
ये हिन्दुस्तानी ग़ज़लें हैं। हिन्दी ग़ज़ल भी कह सकते हैं इन्हें। इनकी भाषा में हिन्दी की गन्ध सहज ग्राह्य है जबकि उर्दू की खुशबू बराये-नाम है।
5. यदि इन ग़ज़लों की रचना में बहरों के छन्दानुशासन का पालन किया गया है तो इन्हें ‘उर्दू ग़ज़ल’ क्यों न कहा जाय ?
इसलिए कि इनमें प्रयुक्त शब्दावली तत्सम-तद्भव युक्त हिन्दी की शब्दावली है, अरबी-फारसी की समासयुक्त शब्दावली नहीं :
बोलने पर भी लगा प्रतिबन्ध तो फिर क्या करूँ ?निभ नहीं पाता मधुर सम्बन्ध तो फिर क्या करूँ ?छटपटाता प्राण-पक्षी, देह पिंजरे में पड़ा—ज़िन्दगी का मौत से अनुबन्ध तो फिर क्या करूँ ?दर्द की अनुभूतियाँ हैं, इस तरह छेड़े मुझेबन्द हैं आनन्द के स्कन्ध, तो फिर क्या करूँ ?इसे उर्दू तो नहीं कहा जा सकता । यह हिंदी ग़ज़ल ही है ।
6. आपसे सहमत हूँ। वस्तुतः हिन्दी-उर्दू तो एक तने की दो शाखाएँ हैं जिनमें जीवन-सत्य के रूप में प्रवाहित शब्द सम्पदा बहुलांश में सांझी है । शब्दों या लिखनेवाले के धर्म अथवा विधा के आधार पर हिन्दी-उर्दू की पहचान नहीं की जा सकती।
उर्दू तो मरणोन्मुखी है। वह देवनागरी लिपि न अपनाये तो जी नहीं पायेगी। उर्दू के तमाम शायरों को जितना मान-प्रतिष्ठा और श्रोता हिन्दी में मिले उतने उर्दू में नहीं मिले। ख़ुसरो-कबीर से आज तक जिन शायरों-कवियों ने हिन्दी-उर्दू को नीर-क्षीर की तरह मिलाया वे कालजयी हो गये।
7. आपने ‘हिन्दी ग़ज़ल : उद्भव और विकास’ में इन प्रसंगों की विस्तार से चर्चा की है। ग़ज़ल को ‘गीतिका’ शीर्षक दिये जाने के सम्बन्ध में आपकी सोच क्या है ? विशेष कर तब जब कि ‘गीतिका’ नाम से 26 मात्रिक छन्द, जिसमें 14-12 पर यति तथा पंक्त्यांत में लघु-गुरु अनिवार्य होता है, पिंगल में वर्णित है । ग़ज़ल को ‘गीतिका’ नीरज जी ने कहा । विराट जी इसे ‘मुक्तिका’ कहते हैं। इसे ‘अनुगीत’ और ‘तेवरी’ भी कहा गया।
अपनी प्रसिद्धि के लिए ग़ज़ल को लोग कोई भी नाम दें, अन्ततः ग़ज़ल को ग़ज़ल ही कहा जायेगा।
8. दोहा को भी अनेक नाम मिले किन्तु अन्त में दोहा ही प्रचलित रहा । कठिनाई अतिवादियों के कारण होती है । उर्दू में क, ज, ह, ग, ख आदि ध्वनियों के लिए दो या तीन वर्ण हैं जबकि हिन्दी में केवल एक । हिन्दी का ग़ज़लकार जब काफ़िया मिलाता है तो वह उर्दू के किस वर्ण में है उसे मालूम नहीं होता। ऐसे में उर्दूवाला हिन्दी की ग़ज़लों को खारिज़ कर देता है। इससे बने के लिये अन्य नाम दिये जाते हैं।
हिन्दी ग़ज़ल में हिन्दी व्याकरण पिंगल लागू होगा। यहाँ मात्रा घटाना-बढ़ाना दोष माना जाता है। हिन्दी वाले तो उर्दू ‘तक्तीय’ के अनुसार लिखी ग़ज़ल को खारिज़ नहीं करते। साहित्य संकीर्णता और कट्टरता नहीं, सहनशीलता और समझदारी की राह दिखाता है
9. ‘रूक्न’ मूलतः फारसी शब्द है। इसके विविध समुच्चयों से बनी रुक्नों को समझना और याद रखना हिन्दी के रचनाकार और पाठक दोनों के लिए कठिन होता है। यदि इसका सरलीकरण या भारतीयकरण कर समान मात्रा भार के सार्थक हिन्दी शब्द प्रयोग में लाए जायें तो इस सम्बन्ध में आपकी क्या सोच है ?
ऐसा करने में कोई हानि नहीं है। सरलीकरण से अच्छी रचनाएँ लिखी जा सकें तो अच्छा है।
10.‘रूक्न’ मूलतः फारसी शब्द है। इसके विविध समुच्चयों से बनी रुक्नों को समझना और याद रखना हिन्दी के रचनाकार और पाठक दोनों के लिए कठिन होता है। यदि इसका सरलीकरण या भारतीयकरण कर समान मात्रा भार के सार्थक हिन्दी शब्द प्रयोग में लाए जायें तो इस सम्बन्ध में आपकी क्या सोच है ?
ऐसा करने में कोई हानि नहीं है। सरलीकरण से अच्छी रचनाएँ लिखी जा सकें तो अच्छा है।
डॉ० रोहिताश्व अस्थाना
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